चलो दीया जलाते है (CHALO DIYA JALATE HAI)

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चलो एक दीया जलाते हैं

किसी के घर की रोशनी बन जाते हैं

खुद के घर को तो बचपन से ही रोशन किया

अब किसी गरीब के घर का अंधेरा मिटाते है

दिवाली खुशियों का है त्योहार सुना बहुत, अब सच में खुशियां फैलाते हैं

चलो एक दीया जलाते हैं…

 

किसी मासूम के चेहरे पर रोशनी सी जगमगाती मुस्कुराहट लाते हैं

किसी गरीब की झोपड़ी में स्वागत की रंगोली बनाते हैं

खुशियों का असल मतलब भूल सी गई है ये दुनिया, चलो इन्हे दिवाली का सही अर्थ समझाते हैं

चलो एक दीया जलाते हैं

 

पटाखों की गूंज में नही

इस बार किसी की मुस्कुराहट में सुकून पाते हैं

खुद का खुद से जो रिश्ता टूट सा गया उसे फिर से बनाते हैं

चलो एक दीया जलाते हैं..

 

इस बार दिवाली पर मां के साथ नहीं याद बहुत आएगी

शायद ये दिवाली एक नई बात समझा कर जाएगी

साथ रहकर भी अपनो की परवाह न करके हम रिश्तों में कमी जो कर जाते हैं

घर के वो लम्हें अब अकेले में याद आते हैं

उन लम्हों को प्यार में संझों कर एक विश्वास दिलाते हैं

चलो एक दीया जलाते हैं

 

 

घर, परिवार, समाज, अपने, पराए, देश से किया प्यार का हर वायदा निभाते हैं

इस बार अपनों के साथ किसी और के घर में भी रोशनी फैलाते हैं

चलो एक दीया जलाते हैं..

किसी के घर की रोशनी बन जाते हैं

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दोस्ती! मेरे दोस्ती की है कहान

 

मेरे कुछ दोस्तों की है ये कहानी , कुछ जानी कुछ पहचानी

सबकी अपनी ही कुछ बात है, कुछ अलग करने का विश्वास है

बातों बातों में जिंदगी का फलसफा बताते है

अपनी-अपनी कहानी अपने अंदाज में बताते हैं

फटे जेब की फटहाली पर हम सारे दोस्त हसते हैं

सिगरेट के लिए पैसे कौन निकाले एक दूसरे का मुंह तकते हैं

कहानी एक सी, किरदार है अलग अलग

दोस्ती पर विश्वास एक सा, बस भरोसा जताने के अंदाज़ हैं अलग अलग

कहानी से पहले किरदारों पर आता हूं….

हम सबकी ज़िंदगियो कैसे एक दूसरे के बिन अधूरी , ये तुम्हे बतलाता हूं..

किरदारो में पहला नंबर जिसका आता है, दिलदार हीरो  के नाम से जाना जाता है

बातों में तेज़, हर बात जिसने संभाली , दिलो को जीतता है, साला प्यार में भी देता है गाली…

दूसरा किरदार इस कहानी का एक अनोखा नाम है, इस ग्रुप को जोड़े रखना ये इसका काम है

पागलपंती की हरकतो से डांट हमेशा वो खाता है, उमर में सबसे छोटा इसलिए हमेशा सॉरी बोलकर निकल जाता है

मेरे दोस्तो में एक ऐसा समझदार किरदार भी आया, जिसने सच में मुझे दोस्ती का मतलब समझाया

मेरे घर को अपना घर और घरवालों को अपनी जान मानता है, जिंदगी में दोस्ती की अहमियत क्या मुझसे ज्यादा ये जानता हैं-

कहानी के अगले किरदार को दोस्ती की नींव में कहूंगा, अबूझी सी पहेली, कोई अनसुलझी चीज़ में कहूंगा

देखने में जितने सरल, काम में उतने विराट हैं, हर चीज़ को चुटकी मारकर इज़ी कहना, ये उनकी आर्ट है..

 

शहर एक सा काम एक सा मस्ती का इंतज़ाम भी एक सा

सैलरी मिलने के 10 दिन , तीनो अय्याशी के शहंशाह

जैसे जैसे दिन खत्म तीनो बदहाली के बादशाह,

पहले नोटो से भरी जेबें, बाद में सिक्के टटोलती है

खुद के पर्स छोड़ दूसरे  दोस्त के पर्स को बटोरती है

दोस्ती का एक अनोखा रुप भी यहां दिखता है

जब दारु के लिए , दोस्त का कच्छा तक यहां बिकता है

मैं नहीं कहता की हम, तीन किसी वजह से एक साथ है

लेकिन वजह ना होते हुए भी हम में कुछ बात है

एक दूसरे के अधूरे समय को हम दोस्ती की बातों से पूरा करते हैं

मुसीबत एक पर हो, सारे मुसीबत से बातें करते हैं

ये कहानी से ज्यादा दोस्ती का फलसफा है

जिसके पास है वो खुशनसीब, जिस पर नहीं वो मुश्किलों में फंसा हैं।

दोस्ती के अर्थ की दास्तान खत्म यही करना चाहूंगा

अब दारु भी पीनी है बाकी फिर कभी बताउंगा।1507468861129

थक जाता हूं..

सोचकर ये थक जाता हूं..
भीड़ में अकेला क्यों पड़ जाता हूं..
दूसरों की तरह मैं भी हाड़ मांस का ही तो बना हूं.
तो इस दुनिया के बनाए बेमाने असूलों को क्यों नहीं निभा पाता हूं..

मेरी सोच पर रोज़ शक होता है मुझे
जो कर रहा हूं , वो ठीक है या बस किसी भीड़ का हिस्सा बनना चाहता हूंं।..

अनकही बात..

तुम क्या हो मेरे लिए ये बात अनकही है
तुमसे कह भी न पाउं तो भी सही नहीं हैं..

बिन मांगे इतना प्यार जो कर जाते हो
ना समझ मैं रोज़ सोचना ,इतने प्यार से रिश्ते कैसे निभाते हो..

हज़ारों में भी तुम्हारा चेहरा नज़र नहीं आता है
सोच,समझ आया कि खुदा तुम्हे सिर्फ दुआ के लिए बनाता है

मै जो कुछ कहूं, कुछ आफत में आकर
दरियादिली न दिखाना शऱाफत में आकर

तुमको पाने का ख्वाब न देखूं तो गलत न समझना
तुझे पाकर खोने का इल्म नहीं रखना खुदा के पास जाकर

By – Ankur sharma

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याद..

आज आखों में नमी फिर आ गई..

पुरानी एक याद दिला गई..

एक चेहरा जिसे यादों से मिटा दिया था..

कही राहों में जो उससे रुबरु हुए, तो पलखों पर परोसा आसूं बहा गई…

सोच-सोच में, सोच सोच के, आधी ज़िंदगी बिता गए.. एक दिन बैठकर यू हीं, सोचा तो समझ आया, सारा ज़रुरी वक्त गवां गए… इस सोच ने उस दौड़ का ख्याल ज़हन में ला दिया… ऐसा लगा दबी हुई ख्वाहिशों को फिर जगा दिया.. ज़िदंगी की दौड़ में इतनी तेज़ क्यों भागा मैं.. अपनो ने इतना […]

via सोच.. SOCH. — सोच

सोच.. SOCH.

सोच-सोच में, सोच सोच के, आधी ज़िंदगी बिता गए..

एक दिन बैठकर यू हीं, सोचा तो समझ आया, सारा ज़रुरी वक्त गवां गए…

इस सोच ने उस दौड़ का ख्याल ज़हन में ला दिया…

ऐसा लगा दबी हुई ख्वाहिशों को फिर जगा दिया..

ज़िदंगी की दौड़ में इतनी तेज़ क्यों भागा मैं..

अपनो ने इतना जगाया फिर भी ना जागा मैं..

उस समय कदम थाम लिए होते, तो आज किसी के साथ होता..

अपनी ख्वाहिशों को पन्ने पर उलटकर कभी ना रोता..

एक बार वक्त को दरिए को रोकना चाहता हूं मैं..

जहां से दौड़ लगानी सीखी वहीं पहुंचना चाहता हूं मैं…

शायद इस बार कोई मेरे कदमों को थाम लें..

और कोई ऐसा मिले, जो मेरे जाने के बाद भी अपनी ख्वाहिशों में मेरा नाम ले।